Saturday, 5 December 2015

एक रचना यूं ही...

तेरा दिल चुराई न होती |

पलको में ख्वाब सजाई न होती |

मुझे क्या पता रुसवा कर जाएगा,

तो माथे पर विंदिया सजाई न होती |

बहारो में खिजा आई न होती,

मेरे ख्वाबो की कालिया मुरझाई न होती |

आखो की निदिया चुराई न होती,

सपनों में सही ख्वाब सजाई तो होती |

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