Friday, 16 August 2013
Wednesday, 17 July 2013
काश ! मैं बच्चा होता
माँ ! माँ ! मैं फिर से बच्चा बनना चाहता हूँ | मुझे अपने आंचल में छुपा लो
माँ ! मुझे वही कहानी सुनाओ जो सुनाया करती थी | मैं इस देश दुनियां से
अनभिज्ञ रहना चाहता हूँ | मैं इन लोगों का रुदन बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा |
भ्रष्टाचार की डरावनी चीखें, भूखमरी के विलाप से अच्छा है कि मैं बच्चा ही
रहूँ, कभी बड़ा न होऊं |
काश ! मैं बच्चा होता,
खाता खेलता हँसता,
लोरी सुनकर सोता,
काश ! मैं बच्चा होता |
काश ! मैं बच्चा होता,
सुख सपनों में खोता,
चाद तारों के लिए रोता,
काश ! मैं बच्चा होता |
काश ! मैं बच्चा होता,
नानी, दादी से कहानी सुनता,
माँ के आंचल में छुपकर सोता,
काश ! मैं बच्चा होता |
काश ! मैं बच्चा होता,
माँ के हाथों रोटी खाता,
भूखमरी, बेरोजगारी से न रोता,
काश ! मैं बच्चा होता |
Saturday, 6 July 2013
क्यों ? क्यों ? क्यों ?
मै चुप हूँ, क्यों ? क्योंकि मैं दर्द से व्याकुल हूँ | घुटन हो रही
है, मैं दर्द का बयाँ किससे करूं | क्यों करूं ? मेरे लिए चुप रहना क्यों बहुत अहम है ? क्योंकि अपना दर्द बयाँ करते
हुए डर लगता है | यदि मैं ईश्वर से कहूँ तो , ईश्वर सर्वव्यापक है उनसे कहने की जरूरत ही क्या है | वह सब
देख रहा है | फिर ऐसी लीला क्यों ? यदि मैं इंसान से कहूँ तो क्यों ? जो संवेदनहीन हो गया, अपनी मानवता को खो चुका है और दरिंदगी को अपना लिया है | इससे तो अच्छा है मैं चुप ही रहूँ लेकिन ये आंसुओ
का सैलाब जो मेरे नेत्र से निकल रहे हैं | इसे कैसे बंद करूं या उस इंसानियत को खोजने की कोशिश करूं
जो कहीं खो गयी है | नही मुझे अब इंसानियत में भी खोट नजर आ रही है | सत्य में भी असत्य की झलक महसूस
हो रही है | ये मैं क्यों कह
रही हूँ क्योंकि मैं भी सशंकित हूँ | क्या सत्य है क्या असत्य है, मुझे तो कुछ
समझ में नहीं आ रहा है |
- समाज में व्याप्त इंसान की संवेदनहीनता के लिए
- समाज में व्याप्त इंसान की संवेदनहीनता के लिए
Tuesday, 25 June 2013
विनाशकारी घटना
उत्तराखंड के इस विनाशकारी घटना को
देखकर दिल दहल गया |
हे
भगवान ! ये क्या हुआ ? हर
पल उन लोगों की सलामती का दुआ करती रही कि भगवान सभी को सलामत रखे लेकिन जब मैंने
टीवी पर एक पिता के मुख से उसके बेटे की मौत की दर्दनाक घटना के बारे में सुना, लुटेरों के बारे में सुना तो सन्न रह गयी | इतनी अमानवीयता ! इस अमानवीयता की
जितनी भर्त्सना की जाय कम है |
Friday, 1 March 2013
लोक साहित्य
लोक साहित्य आधुनिक हिन्दी का श्ब्द है यह दो शब्दो के योग से बना है लोक और साहित्य। साहित्य का अर्थ तो सभी जानते हैं परन्तु लोक शब्द का प्रयोग एक विशिष्ट अर्थ देता है । लोक -साहित्य जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा जनता के लिए लिखा गया है। लोक साहित्य लोक मानस की सहज और स्वभाविक अभिव्यक्ति है। जो अपनी मौखिक परम्परा द्वारा एक पीढी से दूसरी पीढी तक बढता रहता है । उसकी आशा -निराशा, हर्ष-विषाद, जीवन-मरण, लाभ- हानि, सुख- दुख आदि की अभिव्यंजना जिस साहित्य में होती है, वह लोक साहित्य है जो गीतों और कहानियों के माध्यम से अपने हार्दिक सुख- दुख की भावनाओं का प्रकाशन करता है।
लोक साहित्य के अन्तर्गत लोक गीत, लोककथा, लोककहानी, चुटकुले, पहेलिया, कहावते, मन्त्र आदि समाहित है। लोक गीत जो बहुत ही ह्दयस्पर्शी होते हैं ।
-----------------
" काहे को ब्याही विदेश, रे लक्खी बाबुल मोरे
भइया को दीन्हें महल दुमहले, हमको दियो परदेश रे"
ऎसे ही मै एक गीत लिख रही हूँ शायद आपकी दिल को छू जाय--------
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
धिया के वियहल बिपतिये में
कन्यादान पहिले तू कुछु ना जनवल
मूरख गवार हाथे बेटी के लगवल
हुडु.क समाइल हमरा छतिया में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
गोदिया मे खेलनी अगनवा दुवरवा
सान्झी दुपहरिया मे घर से बहरवा
सपना देखिला इहे रतिया में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
सासु ननद जी के भावे नाही बतिया
देवरु पिया के चाही होन्डाकार थतिया
ससुरा के मन दवलतिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
होई गइली रतिया सुहागवा सपनवा
पल-पल बरिस बुझाला हमरा मनवा
सुख के सिंगरवा अफ़तिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
हाय; माई बाबू जी हो इहे बा खबरिया
भेज दीह भइया संगे कइसनो सवरिया
जीयतानी कइसहूं ससतिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
फ़ूके के तयारी होता फ़ांसी के जतनवा
करता धक धक जीयरा परनवा
छूटि गईली देह दुरगतिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
लोक साहित्य के अन्तर्गत लोक गीत, लोककथा, लोककहानी, चुटकुले, पहेलिया, कहावते, मन्त्र आदि समाहित है। लोक गीत जो बहुत ही ह्दयस्पर्शी होते हैं ।
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" काहे को ब्याही विदेश, रे लक्खी बाबुल मोरे
भइया को दीन्हें महल दुमहले, हमको दियो परदेश रे"
ऎसे ही मै एक गीत लिख रही हूँ शायद आपकी दिल को छू जाय--------
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
धिया के वियहल बिपतिये में
कन्यादान पहिले तू कुछु ना जनवल
मूरख गवार हाथे बेटी के लगवल
हुडु.क समाइल हमरा छतिया में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
गोदिया मे खेलनी अगनवा दुवरवा
सान्झी दुपहरिया मे घर से बहरवा
सपना देखिला इहे रतिया में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
सासु ननद जी के भावे नाही बतिया
देवरु पिया के चाही होन्डाकार थतिया
ससुरा के मन दवलतिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
होई गइली रतिया सुहागवा सपनवा
पल-पल बरिस बुझाला हमरा मनवा
सुख के सिंगरवा अफ़तिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
हाय; माई बाबू जी हो इहे बा खबरिया
भेज दीह भइया संगे कइसनो सवरिया
जीयतानी कइसहूं ससतिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
फ़ूके के तयारी होता फ़ांसी के जतनवा
करता धक धक जीयरा परनवा
छूटि गईली देह दुरगतिये में
बाबू जी हो सोचल विचरल न मतिया
Sunday, 9 December 2012
दहेज/Old Post-6
दहेज प्रथा ने आज सम्पूर्ण समाज को इतने
प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया हैं कि व्यक्ति,परिवार तथा समाज के जीवन
में विघटन की दशा उत्पन्न हो गयी हैं। इसका सबसे बडा़ दुष्परिणाम पारिवारिक
विघटन के रूप में हमारे सामने आया हैं। जब कभी भी वर पक्ष को दहेज में
इच्छित सम्पत्ति और उपहार प्राप्त नही होते तो इसके बदले नव-वधू को तरह-
तरह से अपमानित किया जाता हैं। इससे नव दम्पत्ति का पारिवारिक जीवन विघटित
हो जाना बहुत स्वभाविक हैं। दहेज प्रथा स्त्रियों की समाजिक स्थिति को
गिराने वाला एक प्रमुख कारण सिद्ध हुई हैं। इसके कारण प्रत्येक परिवार में
पुत्री के जन्म को एक भावी विपत्ति’ के रूप में देखा जाने लगा हैं। इसी
कारण लड़कियों को पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में लड़्को के समान अधिकार
प्राप्त नही हो पाते। दहेज व्यक्तियों में ऋणग्रस्तता की समस्या को अत्यधिक
बढ़ावा दिया हैं। दहेज का प्रबंध करने के लिए अधिकांश व्यक्ति या तो ऋण पर
निर्भर होते हैं या सम्पूर्ण जीवन अपने द्धारा उपार्जित आय का
स्वतंत्रतापूर्वक उपयोग नही कर पाते। भारत में जैसे-जैसे दहेज प्रथा की
समस्या गम्भीर होती जा रही हैं। नव विवाहित स्त्रियों द्धारा की जाने वाली
आत्महत्याओं की संख्या भी बढ़ती जा रही हैं। यह समस्या समाज के सम्भ्रांत,
समृद्ध और सशक्त वर्ग से सम्बंधित होने के कारण यह जानना भी कठिन हो जाता
हैं कि ऎसी दुर्घटना को हत्या कहा जाय या आत्महत्या। जैसे- जैसे स्त्रियाँ
दहेज के विरुद्ध जागरुक होती जा रही हैं, उनकी समस्या सुलझने के स्थान पर
और अधिक जटिल बनती जा रही हैं। भारत में दहेज प्रथा उन्मूलन करने के लिए
सरकार ने सन १९६१ में एक दहेज निरोधक अधिनियम लागू किया लेकिन असफल रहा। इस
अधिनियम को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने के लिए सरकार ने सन १९८३ में कानून मे
संशोधन किया इसके अतिरिक्त सरकार ने सन १९८५ में भी एक नया कानून बनाया
जिसे ‘दहेज निरोधक अधिनियम १९८८’ कहा गया। यह सम्पूर्ण भारत में २ अक्टूबर
१९८५ में लागू हो गया। इन सब प्रयत्नों के बाद भी यह हैं कि सरकार का कोई
भी वैधानिक अथवा प्रशासकीय प्रयत्न दहेज की समस्या को कम नही कर सका। दहेज
के इस कलंक को मिटाने के लिए समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता
हैं। इस अभिशाप को मिटाने के लिए युवक और युवतियों को सजग होकर इसका विरोध
करना चाहिए। इस दहेज रूपी दानव से युवक ही मुक्ति दिला सकते हैं यदि वे यह
संकल्प कर ले कि हम बिना दहेज का विवाह करेंगे तो दहेज माँगनेवालो को कड़ी
से कड़ी सजा दिला सकते हैं। इससे हमारे समाज से दहेज लोभी अवश्य दूर हो
जायेंगे।है न...
6 comments:

यदि वे यह संकल्प कर ले कि हम बिना दहेज का विवाह करेंगे तो दहेज माँगनेवालो को कड़ी से कड़ी सजा दिला सकते हैं। इससे हमारे समाज से दहेज लोभी अवश्य दूर हो जायेंगे...Reply
सही कहा आपने ....!!
आश्चर्य है कि अभी भी लोग इसे लेने और देने में विश्वास रखते हैं। लेखनी से एक अच्छा प्रयास किया है इस सामाजिक समस्या से निबटने का।Reply
nahin main aapse sahmat nahin .. har samsya ka samadhan uske karno mein chhipa hota hai..dahez ladki ko uske pita se milne wala vah dhan hai jo use pita ki sampati se milna tha yadi vah ladka hoti .. galti dahhez mein nahi uske anupalan mein hai.. na ladki ke mata pita ko na hi var paksh ke logon ko ye adhikar hai ki ladki ke bhag ke is dhad ko idhar udhar ki vyarhttaon aur dikhavon mein ujad dein ..ye poori kadai ke sath ladki ke nam se bank ya kisi jaydad ke roop mein surkshit rahna chahiye.. (koi sarkari agency iski custodian honi chahiye)..(iska pata bhi ladki ke pita aur ladki ke siva anay kisi ko nahin hona chahiye..) jo ya to bahut aadey samay mein ya aage bacchon ke kam aa sake.. iske liye jaroori hai ki shadi ki rasmey bahut sadgi se hon .. var paksh par bhi koi dvab nahin hona chahiye..behtar ho ki shadiyan court mein ragistar hon 5-5 log dono pakshon se aayein bat khatam .. aaj ke samay ko dekhte hue shadi to bahut hi vyarth si cheez lagne lagi hai ..mujhe lagta hai matrisatatmak samaj bhi achha vikalp ho sakta hai..ye bahas kisi sahi nishkarsh tak pahoonchey bina ab rukni nahin chahiye.. osho ne ek bat kahi thi aadhe adure man se ladi jane wali koi bhi ladai hare jane ke liye hoti haiReply
बहुत सही जगह प्रहार कर रही हैं आप। यह प्रथा ,परम्परा या लालच सभ्य समाज पर अभिशाप है।Reply
Dahej ka swaroop aaj bhale hi badal gaya hai lekin wah aaj bhi kam ghatak nahi..Reply
bahut badiya aalkeh..aabhar!
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Aapki baat se sahmat hoon.