Monday, 9 December 2019

विषय-मित्रता

मित्र वही जो साथ निभावे।
डूबी नैया पार लगावे।।
मित्र अगर हो अवसरवादी।
करता जीवन की बरवादी।।

साथी से ही जीवन चहके।
जीवन बगिया उससे महके।।
लाता जीवन में हरियाली।
विखरे ज्यों सबेर की लाली।।

धर्म जाति का भेद न करता।
सच्चा साथी बनकर रहता।।
जैसे हो वैसे अपनाता।
असली मित्र वही कहलाता।।

साया बनकर साथ निभावे।
मुश्किल में ताकत बन जावे।।
हर रिश्तों से ऊपर होता।
गंगा जल-सा पावन होता।।

चौपाई छंद-माँ

सबसे प्यारी जग से न्यारी,
खुशियां देती हमको सारी।
माँ का आँचल है फुलवारी,
खुशियों की रहती किलकारी।

बिन लोरी रोया करती थी,
पलके ना सोया करती थी।
मेरी माँ का रूप सलोना,
मैं हूँ माँ का असली सोना।

माँ दुनियां में सबसे न्यारी,
सींचा करती जीवन क्यारी।
चलना खाना हमें सिखाती,
मंजिल पर हमको पहुंचाती।

हम छंद अगर वो कविता है,
हम लव-कुश तो वह सीता है।
छाया बनकर साथ निभाती,
सबके मन को हैं वो भाती।

चौपाई छंद-पिता

पिता सम नहीं कोई दूजा।
मात-पिता की कर लो पूजा।।
यदि उनकी आशीषें पायें।
हम जीवन भर ही मुस्कायें।।

श्रम करना हमको बतलाया।
दुर्गम पथ चलना सिखलाया।।
पिता बिना हम समझ न पाते।
जीवन पथ पर फिर घबड़ाते।।

 पिता एक उम्मीद रहे हैं।
आस और विश्वास रहे हैं।।
मात–पिता की सेवा कर लो।
फिर जीवन में खुशियां भर लो।।

धरती माता

जग जननी धरती कहलाती।
पानी बिन बंजर बन जाती।।
शीत धूप को सहती रहती।
धरती माता कुछ ना कहती।।

सूरज चीर क्षितिज जब आता।
फिर तरु-पल्लव को झुलसाता।।
कितना पीड़ादायक होता।
देख व्यथा फिर मानव रोता।।

प्रकृति नष्ट ना मानव करता।
फिर विपदा से कभी न  लड़ता।।
जड़ चेतन में जोश जगाते।
सूरज अपना धर्म निभाते।।

बादल बनते हैं जब दुल्हे।
तभी घरों में जलते चुल्हे।।
साज बाज सह लेकर आते।
गरज- गरज कर जल बरसाते।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
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लाली विखरे भोर की,चिड़िया करती शोर।
मंद मंद शीतल हवा,बहती चारो ओर।।
बहती चारो ओर सुबह में रहती हलचल।
नदियां प्रेम प्रवाह सदा बहती है कलकल।
हो सबका कल्याण अगर होगी हरियाली।
मनवा भाव विभोर देख सूरज की लाली।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
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ऐसा भोजन कीजिए,होवे नेक विचार।
तन मन को शीतल करे,कभी न हो बीमार।।
कभी न हो बीमार अगर संयम से रहते।
रखते नेक विचार नित योग यदि तुम करते।
सेहत होगी ठीक सुनो कहती हूँ जैसा।
बढ़ता जिससे खून करो भोजन तुम ऐसा।

दोहा

झूठ बोलना पाप है,छोड़ कपट का भाव।
राह भले काँटो भरी, बदलो नहीं स्वभाव।।

दोहा

निर्मलता हो नीर-सी,सदा रहे सद्भाव।
धनाभाव के कारने,बदले नहीं स्वभाव।।     

दोहा

आओ सीखें फूल से,देते खुशी अपार।
पल भर की है जिंदगी,पर सुंदर व्यवहार।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
जागो अब रजनी गयी,भर लो मन में जोश।
आलस को तुम मात दो,मत खोवो तुम होश।।
मत खोवो तुम होश, समय की कर रखवारी।
नहीं रहे लाचार, फले जीवन की क्यारी।।
मान लता की बात,नहीं श्रम से तुम भागो।
यही समय है चेत,सुबह अब तुम नित जागो।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
आँखे मन का आइना, सबसे सुंदर अंग।
आँखे सब कुछ बोलती,भरती यही उमंग।।
भरती यही उमंग हमे दुनिया दिखलाती।
जब भी करती बात मौन वाणी हो जाती।।
नयनन प्रेम समाय हिया में हरदम राखे।
जब हो मन में पीर नीर भर ले तब आंखे।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया

गोरी बाट निरख रही,कर सोलह श्रृंगार।
मिलन चाह उपजे हिया,कब होगा दीदार।।
कब होगा दीदार,चाँद तुम जल्दी आना।
पिया मिलन की आस,देर तुम नहीं लगाना।
सात जनम हो साथ,करू विनती कर जोरी।
लता कहे हर बार,बनूं साजन की गोरी।

जय माँ शारदे

हे माँ नव उत्थान दो, नव गति, नव लय तान।
लता करे नित आरती,उर में उपजे ज्ञान।।

अभिमान पर दोहा

रुके राह अज्ञान की,बने सभी विद्वान।
प्रेम ज्योति ऐसी जले,मिट जाये अभिमान।।

प्रदूषण पर दोहा

वायु प्रदूषण हो रहा,फैल रहा है रोग।
झेल रहा है फेफड़ा,किससे कहे वियोग।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
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लाली छाई गगन में,दिनकर किरणें संग।
सजी घाट पर आरती,मन भावन है रंग।।
मन भावन है रंग,नैन सूरज जब खोले।
हुई सुहानी भोर,पवन शीतल फिर डोले।
सभी खड़े कर जोर,आरती की ले थाली।
कंचन देती अर्घ,देख सूरज की लाली।।

जय श्री राम

वन वन भटके राम
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ऐसे सुत श्री राम थे,नहीं लिए सुख धाम।
आज्ञा का पालन किये,वन वन भटके राम।।
सीता जी की खोज में,वन वन भटके राम।
रावण का संहार कर,लौटे अपने धाम।।

दोहा

धन- दौलत दिन चार के,मत करना अभिमान।
अपने सद व्यवहार को,सच्ची दौलत मान।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
ऐसे भी कुछ जगत में,जो मतलब से साथ।
डूबी नैया देख के,छुड़ा लिया है हाथ।।
छुड़ा लिया है हाथ,साथ वो नहीं निभाते।
दुख में जो दे साथ,वही साथी कहलाते।
कोई सच्चा मीत, बताओ परखू कैसे।
हरपल दे जो साथ,मीत ढूंढू में ऐसे।

कुण्डलिया

कुण्डलिया
तुलसी आँगन में जहाँ, बनते बिगड़े काम।
सेवन करते पात का,नहीं रोग फिर धाम।।
नहीं रोग फिर धाम,सदा रहती खुशहाली।
औषधि से भरपूर,रहे इसकी हरियाली।
आँगन तुलसी देख,हिया कंचन की हुलसी।
देती नित जलधार,वृक्ष औषधि है तुलसी।